http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग

Tuesday, July 11, 2017

अमरनाथ यात्रियों की हत्या से उठते सवाल


क्या सचमुच भारत महाशक्ति है?
हालांकि यह आतंकवादियों से भी नहीं जीत पाया
वे आते हैं और निर्दोषों का शिकार कर चले जाते हैं
कश्मीर में रह कर महीनों रेकी करते हैं
स्थानीय लोगों की मदद के बिना ऐसा मुमकिन है क्या?
इजरायल जैसा छोटा देश आतंकवाद को कुचलने में सक्षम
हम सिर्फ बख्शेंगे नहीं, मुंहतोड़ जवाब देंगे कह कर रह जाते हैं
जो यात्री मारे गये जरा उनके घर जाकर दोहराइए सरकार ये जुमले
ना बैठक चाहिए न मंत्रणा, अब सिर्फ और सिर्फ डाइरेक्ट एक्शन ही चाहिए
कहते हैं जून में ही सुरक्षा एजेंसियों ने ऐसे हमले का एलर्ट दे दिया था
फिर कैसे हुई यह चूक?
लानत है उन बुद्धिजीवियों पर जो आज भी पाक से बात करने की वकालत करते हैं
जो देश आप पर बंदूक ताने है, उसे पुचकारेंगे कि भैया कृपया बात कर लो
और हां, कहां है मानवाधिकार ब्रिगेड जो आतंकियों की मौत पर मातम मनाती है
शायद इन निरीह यात्रियों की मौत उनके लिए कोई मायने नहीं ऱखती
ये मानवाधिकार का मुद्दा नहीं बन सकता है शायद
हम एक महान देश हैं बहुत ही महान
हम सरकारी खर्चे पर कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को सुरक्षा देते हैं
अगर राज्य सरकार सक्षम नहीं तो लगाइए राष्ट्रपति शासन
अमरनाथ यात्रियों पर हमले से सारा देश गमजदा और सकते में है। पूरा देश अब सख्त से सख्त कार्रवाई चाहता है जो आतंकवादियों की आत्मा तक को हिला दे, भारत की पाक जमीन से उनके पैर पूरी तरह से उखाड़ दे। निरीह यात्रियों को मार कर इन दहशतगर्दों ने यह साफ कर दिया कि उनका एकमात्र मकसद कत्लेआम कर के देश को हिला देना है। बदनसीबी है कि सरकार की सारी कोशिशों के बावजूद वे कामयाब हो रहे हैं। इतने मारे गये फिर भी न इसके हौसले पस्त हुए ना पाकिस्तान के। वह बराबर इनकी खेप कश्मीर में भेजता ही जा रहा है और एक रक्तबीज से लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। पाकिस्तान इसलिए उछल रहा है क्योंकि हमारा चिरपरिचित दुश्मन उसकी पीठ ठोंक रहा है, उसके साथ खड़ा है। ताज्जुब है कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी अब भी मानते हैं कि पाकिस्तान से वार्ता शुरू करनी जरूरी है। एक देश आप पर बंदूक ताने है, अपने यहां से आतंकवादी भेज कर निरीह लोगों को मरवा रहा है और हाथ जोड़िए उसके आगे और कहिए कि कृपया हमसे बात कर लो।
हमारा देश सचमुच महान है, कश्मीर में जो नेता अलगाववाद का परचम बुलंद कर रहे हैं उनकी सुरक्षा पर हमारा देश हर साल तकरीबन पचास करोड़ खर्च कर रहा है। गरीब किसान छोटा-सा कर्ज लेता है तो उस पर सांसत, तरह-तरह की दबिश कुछ खाये-अघाये, अरबों में खेलते लोग बैंकों का करोड़ों डकारे बैठे हैं। अमरनाथ यात्रियों की मृत्यु पर किसी मानवाधिकार संगठन का कोई शोक संदेश मैंने नहीं सुना या पढ़ा। आपने सुना हो तो जरूर बताइएगा। वे आतंकवादियों के पक्ष में खड़े होने को ही शायद मानवाधिकार समझते हैं, इन निरीह लोगों की मृत्यु उन्हें न उद्वेलित करती है ना ही मर्माहत। सचमुच ये सच्चे मानवाधिकारी (?) हैं, हमें इन पर गर्व होना चाहिए। धऱती की जन्नत कश्मीर दोजख बना दिया गया है और कश्मीरी उसे ऐसे होते देख रहे हैं। कोई लाख कहे हम यह मानने को तैयार नहीं कि दूसरे देश से आये आतंकवादी बिना स्थानीय लोगों की मदद के रेकी कर पाते हैं और अपने निशाने तक इतने अचूक ढंग से घात लगा पाते हैं। घाटी में उनके मददगार भी उनकी तरह ही जिम्मेदार हैं। इजरायल जैसा छोटा देश आतंकवाद को कुचलने में सक्षम  हम सिर्फ बख्शेंगे नहीं, मुंहतोड़ जवाब देंगे कह कर रह जाते हैं जो यात्री मारे गये जरा उनके घर जाकर दोहराइए सरकार ये जुमले ना बैठक चाहिए न मंत्रणा, अब सिर्फ और सिर्फ डाइरेक्ट एक्शन ही चाहिए कहते हैं जून में ही सुरक्षा एजेंसियों ने ऐसे हमले का एलर्ट दे दिया था फिर कैसे हुई यह चूक? कश्मीर का चप्पा, चप्पा, जर्रा जर्रा छान मारिए, घर –घर में सघन तलाशी लीजिए जो भी अज्ञात व्यक्ति मिले उससे भारत का पहचान पत्र मांगिए ना दे सके या विरोध में गोलीबारी करे तो फिर या तो उसे कानून के हवाले कीजिए या फिर उसका किस्सा तत्काल वहीं खत्म कीजिए। अब यह नहीं चलेगा कि आतंकी के अंदर रिहाइशी इलाके में सेल्टर लेने और स्ट्रैटजिक पोजीशन में रह कर हमला करने का इंतजार करें वह सीमा पार करे तभी उससे निपट लें। हद हो गयी अब तो इस मुसीबत के खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़ने का वक्त आ गया है। कश्मीर आज दे की दुखती रह बन गया है, अब वहां पर्यटक भी जाने से डरने लगे हैं। वह दिन दूर नहीं जब पर्यटकों की आमद में जिन शिकारा वालों या अन्य लोगों की जिंदगी निर्भर है उनके सामने भूखों मरने के दिन आ जायें। है कोई जो हमारे इस स्वर्ग को बचा सके।
Shocked, stunned by the news of terrorist attack on Amarnath pilgrims in which we lost some innocent and precious lives.  Surprised no one from Human rights brigade surfaced to condemn this heinous act of crime.  I think they only sheds tear for terrorist they don’t have guts to face widows of martyred security forces Juwan’s and show sympathy for them.   
Impose president’s rule in Jammu- Kashmir as present state Government totally failed to control the situation. Enough is enough it’s time to take brave and hard decision.


Monday, April 10, 2017

वाल्मीकि रामायण में हैं राम के होने के प्रमाण


तत्कालीन ग्रह स्थितियों से हुआ प्रमाणित
राजेश त्रिपाठी

कुछ लोग ऐसे हैं जो हर उस चीज को सिरे से नकारते हैं जिसे इतिहास की कसौटी पर खरा न पाया जाये। इसमें कुछ भी अनुचित नहीं लेकिन मेरे विचार से ऐसे भावों का स्तर व्यापक होना चाहिए और किसी काल विशेष या धर्म या पात्र विशेष के लिए ही यह पैमाना नहीं प्रयोग किया जाना चाहिए। इन दिनों धारा और प्रचलित भावों के विरुद्ध चलने का फैशन–सा चल पड़ा है। ऐसा करने वालों को और कुछ हासिल होता हो या नहीं लेकिन उनका जिक्र जरूर होता है क्योंकि लीक पर चलना तो आम बात है जो लीक से हट कर चलते, सोचते हैं वे खबर बनते हैं। अयोध्या में राममंदिर –बाबरी मस्जिद विवाद का निर्णय या तो सर्व सम्मति से
या न्यायोचित ढंग से होना चाहिए यह हर वह नागरिक मानता है जो अपने गणतांत्रिक देश के गौरव और सम्मान के प्रति सचेत है। कोई नहीं चाहता कि इसे लेकर देश में तनाव या अशांति का वातावरण पैदा हो। यह मुद्दा नितांत स्थानीय था अगर इसे उसी स्तर पर वर्षों पहले सुलझा लिया जाता तो शायद देश इस बड़ी उलझन से बच जाता। हमारा आशय इस मुद्दे पर किसी भी तरह की टिप्पणी करने का नहीं है क्योंकि यह अब तक न्यायालय में विचाराधीन है लेकिन न्यायालय ने फिर लोगों को एक मौका दिया है कि वे इसे न्यायालय से बाहर आपसी सहमति से सुलझा लें।
यहां यह संदर्भ सिर्फ इसलिए दिया क्योंकि आजकल कुछ माहौल ऐसा बना है कि कुछ लोग राम और कृष्ण के अस्तित्व तक को नकारने लगे हैं। इनमें वामपंथी विचारधारा वाले तथाकथित बुद्धिजीवी सबसे आगे हैं। उनका कहना है कि राम और कृष्ण काल्पनिक कथाओं के पात्र मात्र हैं उनका कभी इस धरा पर कोई अस्तित्व नही रहा क्योंकि उनका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। यह सच है कि हमारे पास कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं क्योंकि जब ये अवतार हुए तब इतिहास  लिखने की परंपरा थी या नहीं मालूम नहीं। थी भी तो वह संभव है समय  के साथ-साथ नष्ट हो गया हो क्योंकि न तो तब डिजिटलाइजेशन की सुविधा थी न ही कागज की खोज हुई थी। भोजपत्र और वृक्ष  के पत्रों में लिखा जाता था। लेकिन सवाल यह है कि अगर उनको काल्पनिक मान लिया जाये तो उनसे जुड़े जो स्थान आज भी मिलते हैं वे भी नकली ही होंगे। इस कसौटी पर तत्कालीन अन्य विषयों को कसें तो  वे भी निरर्थक और काल्पनिक ही लगेंगे। जहां तक अपनी सामान्य बुद्धि पहुंच पायी है हमें यही समझ आया है कि वाल्मीकि राम के समकालीन कवि थे जिनके आश्रम में सीता पलीं और जहां लव-कुश का जन्म हुआ। सर्वप्रथम रामकथा उन्होंने ही संस्कृत में लिखी जिसके मुख्य पात्र राम रघुकुल के राजकुमार हैं मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं। उन्होंने जहां उचित समझा राम की आलोचना भी की।  तुलसीदास की रचना रामचरित मानस इसके विपरीत है जिसे उन्होंने दास भाव से लिखा है जिनके आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम राम हैं। स्पष्ट है इस भाव से की गयी रचना में आलोचना की गुंजाइश होने के बावजूद आलोचना का प्रयास नहीं होता।
इस प्रसंग को ज्यादा आगे न खींचते हुए मैं अब मूल बात पर आता हूं। जब राम के अस्तित्व पर ही लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिये तो फिर मन किया कि चलो कुछ प्रमाण तलाशें जायें। यह तलाश वाल्मीकि रामायण में ही जाकर थमी जो राम के समकालीन थे। उन्होंने जो लिखा उसे तो प्रामाणिक माना जा सकता है।
सदियों से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का जीवन चरित्र लोगों को सही राह पर चलने की शिक्षा देता आ रहा है, लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या भगवान राम से जुड़ी कहानी सिर्फ कथा है, क्या भगवान राम कल्पना हैं, आखिर हमारे पास भगवान राम के सच होने का क्या कोई प्रमाण है?
रामायण और भगवान राम अगर कल्पना नहीं हैं तो क्या आधुनिक विज्ञान उनके सच होने का कोई प्रमाण खोज सकता है। आखिर सदियों से घूमते समय के चक्र में, बनते बिगड़ते ब्रह्मांडीय घटनाओं के बीच हमारी पृथ्वी पर बनती-बिगड़ती सभ्यताओं की कथाओं के बीच, आखिर किस काल, किस वर्ष, किस तारीख, किस वक्त में और कहां रामकथा से जुड़ी सभ्यताओं का प्रारंभ हुआ।
आखिर किस देश काल में रामकथा से जुड़े पात्र सचमुच बोलते-चलते सशरीर इस दुनिया में थे। अब तक इस सवाल का जवाब हमें वेदों के काल की तरफ ले जाता था।
कहा जाता है कि पांचवीं से चौथी शताब्दी ईसा पूर्व जिस काल को ऋग्वेद का काल कहा जाता है, तभी महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की। लेकिन अब तक इस बात पर इतिहासकारों की राय बंटी हुई थी, लेकिन अब इस बात के सच होने का वैज्ञानिक प्रमाण मिल गया है।
इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑन वेदा यानी आई सर्व नामक संस्था ने जो दिल्ली में स्थित है लंबे वैज्ञानिक शोध के बाद चौंकाने वाला दावा किया है। आई सर्वने आधुनिक विज्ञान से जुड़ी 9 विधाओं, अंतरिक्ष विज्ञान, जेनेटिक्स, जियोलॉजी, आर्कियोलॉजी और स्पेस इमेजरी पर आधारित रिसर्च के आधार पर दावा किया है। भारत में पिछले 10 हजार साल से सभ्यता लगातार विकसित हो रही है। वेद और रामायण में विभिन्न आकाशीय और खगोलीय स्थितियों का जिक्र मिलता है, जिसे आधुनिक विज्ञान की मदद से 9 हजार साल ईसा पूर्व से लेकर 7 हजार साल ईसा पूर्व तक प्रमाणिक तरीके से क्रमानुसार सिद्ध किया जा सकता है।
आई सर्व के निष्कर्ष के मुताबिक एक वक्त जिक्र आया है कि राम के जन्म से भी 2 वर्ष पहले राजा दशरथ ने पुत्रेष्ठि यज्ञ कराया। तब से लेकर हनुमान जी के सीता से मिलने तक करीब 25 के करीब आकाशीय दृश्य हूबहू मिलते हैं। एस्ट्रोनॉमिकल फैक्ट है कि आज जो नक्षत्र हैं वो 25600 साल में दोहराये नहीं जाते। इसे भी वैरीफाई किया गया कि किसी और दिन तो ऐसी स्थिति नहीं थी। इसमें वाकई सच्चाई है किसी ने देखा और ऑब्जर्व किया और रिकॉर्ड किया या नहीं।
तो क्या हजारों साल पहले की चांद-तारों और नक्षत्रों की स्थितियों को बताने वाले प्लैनेटेरियम सॉफ्टवेयर और रामायण से लेकर वेदों में जिक्र नक्षत्रों की स्थिति के तुलनात्मक अध्ययन से जाना जाना जा सकता है कि- क्या है भागवान राम की जन्मतिथि, कब हुआ था रावण का अंत, कब हुआ था राम का राज्याभिषेक, आई सर्व के दावों पर यकीन करें तो इन सभी सवालों का जवाब हां में है। आधुनिक सॉफ्टवेयर की मदद से ना सिर्फ राम की जीवनलीला का पूरा इतिहास जाना जा सकता है अपितु यह भी जाना जा सकता है कि यह समय कब पड़ता है।
धरती के बनने से लेकर आज तक जो कुछ भी हुआ, जो कुछ भी बीता, उसका साक्षी है समय। और समय के साथ ही हर बनने-बिगड़ने वाली घटनाओं का गवाह रहा है-आसमान, जहां खास वक्त पर तारों-ग्रहों और नक्षत्रों की खास स्थितियां नजर आतीं हैं। रोचक यह भी है कि वाल्मीकि रामायण में रामकथा से जुड़ी हर बड़ी घटना का जिक्र खगोलीय स्थितियों के साथ किया गया है। आज देश में चैत्र-शुक्लपक्ष की नवमी को भगवान राम के जन्मदिन की तरह मनाया जाता है तो इसकी वजह भी रामायण में वर्णित तारों की स्थिति ही है।
वाल्मीकि रामायण में भगवान राम के जन्म का वर्णन इस प्रकार है-
ततो ब्रूयो समाप्ते तु ऋतुना षट् समत्युय: ।
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ॥
नक्षत्रेsदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंचसु ।
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह॥
प्रोद्यमाने जनन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम् ।
कौसल्याजयद् रामं दिव्यलक्षणसंयुतम् ॥
राम के जन्म के वक्त का वर्णन करने वाले वाल्मीकि रामायण के इस श्लोक का भावार्थ यह है कि चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में रानी कौशल्या ने दिव्य लक्षणों से युक्त सर्वलोकवन्दित श्री राम को जन्म दिया। अर्थात जिस दिन भगवान राम का जन्म हुआ उस दिन अयोध्या के ऊपर ग्रहों की सारी स्थिति का इस श्लोक में साफ-साफ जिक्र है।
अब अगर रामायण में जिक्र गये नक्षत्रों की इस स्थिति को नासा द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सॉफ्टवेयर प्लैनेटेरियम गोल्ड में उस वक्त के ग्रहों की स्थिति से मिलाया और तुलना की जाये तो उसका परिणाम यह निकलता है-  सूर्य मेष राशि (उच्च स्थान) में। शुक्र मीन राशि (उच्च स्थान) में। मंगल मकर राशि (उच्च स्थान) में। शनि तुला राशि (उच्च स्थान) में।बृहस्पति कर्क राशि (उच्च स्थान) में। लगन में कर्क। पुनर्वसु के पास चन्द्रमा मिथुन से कर्क राशि की ओर बढ़ता हुआ।
शोध संस्था आई सर्वके मुताबिक वाल्मीकि रामायण में वर्णित श्री राम के जन्म के वक्त ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति का सॉफ्टवेयर से मिलान करने पर जो दिन मिला, वो दिन है 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व।
उस दिन दोपहर 12 बजे अयोध्या के आकाश पर सितारों की स्थिति वाल्मीकि रामायण और सॉफ्टवेयर दोनों के अनुसार एक जैसी पायी गयी है। इससे शोधकर्ताओं ने यह परिणाम निकाला कि राम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व को हुआ।
आई सर्वके शोधकर्ताओं ने जब धार्मिक तिथियों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले चंद्र कैलेंडर की इस तिथि को आधुनिक कैलेंडर की तारीख में बदला तो वो ये जान कर हैरान रह गये कि सदियों से भारतवर्ष में राम का जन्मदिन बिल्कुल सही तिथि पर मनाया जाता रहा है। इससे जो जन्मतिथि आती है वो है 10 जनवरी 5114 बीसी जब इसे चंद्र कैलेंडर में परिवर्तित किया गया तो वह चैत्र मास का शुक्ल पक्ष का नवमी निकला। सभी को विदित है कि चैत्र शुक्ल की नवमी को राम नवमी मनाते हैं, तो वही दोपहर को 12 से 2 बजे के बीच समान तिथि निकली है।
सॉफ्टवेयर की मदद से शोधकर्ताओं ने भी ये भी पता लगाया की राम के भाइयों की जन्मतिथि कब पड़ती है। भरत का जन्म पुष्प नक्षत्र तथा मीन लग्न में 11 जनवरी 5114 ईसा पूर्व को सुबह चार बजे लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म अश्लेषा नक्षत्र एवं कर्क लग्न में 11 जनवरी 5114 ईसा पूर्व को 11 बज कर 30 मिनट पर हुआ। वल्मीकि रामायण में उस दिन का भी जिक्र मिलता है जब राजा दशरथ भगवान राम का राज्याभिषेक करना चाहते थे, लेकिन वो तिथि वनवास की तिथि में बदल गयी।
बेल्जियम में जन्में फादर कामिल बुल्के भारत आये तो रामकथा से इतने  प्रभावित हुए कि उन्होंने इसके गहन अध्ययन के लिए न सिर्फ हिंदी सीखी अपितु राम पर शोध ग्रंथ भी लिखा।  वैज्ञानिकता पर आधारित "रामकथा: उत्पत्ति और विकास"  नामक अपने शोध के द्वारा उन्होंने 300 ऐसे प्रमाण पेश किए थे जिनके आधार पर राम के जन्म की घटना को सत्य कहा जा सकता है। भगवान राम से जुड़ा एक अन्य शोध चेन्नई की एक गैर सरकारी संस्था द्वारा किया गया, जिसके अनुसार राम का जन्म 5,114 ईसा पूर्व हुआ था। बुल्के ने लिखा कि वाल्मीकि के राम कल्पित पात्र नहीं, इतिहास पुरुष थे। तिथियों में थोड़ी बहुत चूक हो सकती है। बुल्के के इस शोधग्रंथ के उद्धरणों ने पहली बार साबित किया कि रामकथा केवल भारत में नहीं, अंतरराष्ट्रीय कथा है। वियतनाम से इंडोनेशिया तक यह कथा फैली हुई है। इसी प्रसंग में फादर बुल्के अपने एक मित्र हॉलैन्ड के डाक्टर होयकास का हवाला दिया है। डा० होयकास संस्कृत और इंडोनेशियाई भाषाओं के विद्वान थे। एक दिन वह केंद्रीय इंडोनेशिया में शाम के वक्त टहल रहे थे। उन्होंने देखा एक मौलाना जिनके बगल में कुरान रखी है, इंडोनेशियाई रामायण पढ़ रहे थे। होयकास ने उनसे पूछा,- मौलाना आप तो मुस्लिम हैं, आप रामायण क्यों पढ़ते हैं। उस व्यक्ति ने केवल एक वाक्य में उत्तर दिया- ‘और भी अच्छा मनुष्य बनने के लिए! ‘ रामकथा के इस विस्तार को फादर बुल्के वाल्मीकि की दिग्विजय कहते थे, भारतीय संस्कृति की दिग्विजय!
एक तरफ श्रीलंका का इंटरनेशनल रामायण रिसर्च सेंटर है जो वहां के पर्यटन मंत्रालय से मिल कर रामायण से जुड़े ऐसे 50 स्थल ढूंढ चुका है जिनका पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व है और जिनका रामायण में भी उल्लेख मिलता है। वह इनका  संरक्षण कर रहा है दूसरी हमारे यहां के कुछ तथाकथित विद्वान हैं जो राम के अस्तित्व को भी नकारते हैं। तब तो हमें रामकथा से जुड़े अय़ोध्या (तत्कालीन साकेत), चित्रकूट,अनुसूया आश्रम,भरतकूप, पंचवटी, शृंगवेरपुर, प्रयाग व रामकथा में वर्णित अन्य स्थलों को भी अस्तित्वहीन मानना पड़ेगा। लेकिन ये तो आज भी हैं और श्रद्धावान इन्हें रामकथा से जुड़े स्थलों के रूप में पूजते हैं।
ये संदर्भ मिले हैं अब जिन्हें इनको मानना है मानें, नहीं मानना नहीं माने। यह अवश्य है कि जिनके रोम-रोम में राम हैं वे उनकी प्रामाणिकता खोजने नहीं बैठते। आस्था के प्रश्न इतिहास की कसौटी में नहीं श्रद्धा और निष्ठा के पैमाने में कसे जाते हैं। जहां निष्ठा और आस्था है वहां प्रश्न की कोई जगह नहीं। लोगों की आलोचनाओं से मन व्यग्र और उद्वेलित हुआ इसलिए लिखा अब जिसे इसे जिस संदर्भ में लेना है, जो अर्थ निकालना है निकाले, हमारी आस्था न डिगी है न डिगेगी। बाबा तुलसीदास लिख ही गये हैं-जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
तो आपको आपकी शंकाओं की ग्रंथियां मुबारक, वह आपके सोचने का ढंग है। हम हर बात को प्रश्नों के तराजू में नहीं तौलते, आस्था बड़ी चीज है हम उसी के धरातल पर खड़े हैं और हमें इस पर गर्व है। आप इतिहास की परतें उधेड़िये लेकिन आपके यह भाव एकपक्षीय नहीं होने चाहिए हर पूजनीय या श्रद्धास्पद पात्र को इतिहास की कसौटी पर कसिये देखिएगा आपको निराशा ही हाथ लगेगी। कारण, आपका इतिहास लाखों वर्ष पुराना नहीं है कम से कम पौराणिक काल तक पुराना तो नहीं ही है। इसलिए चीजों को समष्टि में देखिए किसी पात्र विशेष को कठघरे में मत खड़ा कीजिए ,ऐसा कर के आप करोड़ों लोगों की श्रद्धा पर आघात कर रहे होंगे जो संभवत: किसी का अभीष्ट नहीं होगा।



Tuesday, February 21, 2017

कहानी


पैसा बोलता है

राजेश त्रिपाठी

          बर्तन मांजती सुखिया ने रेखा से कहा- मालकिन बच्चा किसना के लिए चिंटू बाबा का कोई पुराना कपड़ा मिल जाता तो बड़ी किरपा होती। दीवाली के लिए उसके नये कपड़े नहीं ले सकती।'
             ‘अच्छा देखूंगी।
            रेखा की बात पर पास बैठी सास ने भौंहें तान लीं। सुखिया के जाने के बाद बहू को डांटा-खबरदार जो चिंटू का कोई कपड़ा उसे दिया।
            रेखा चौंकी, ‘क्यों मां? कितने कपड़े हैं चिंटू के जो उसे अब छोटे पड़ रहे हैं। गरीब है खरीद नहीं सकती। पेट ही भरने का पैसा नहीं जुटता।
            सास ने कहा, -‘मैं क्यों मना कर रही हूं, जानती हो?’
            ‘नहीं मां।
            ‘उसकी सास की सूरत डायन जैसी है। चिंटू के कपड़े पाकर पता नहीं वह क्या टोटका कर बैठे? ना, ना, भूल कर भी न देना।
            रेखा ने फिर कुछ नहीं कहा। वह नये विचारों की थी। डायन-वायन, टोटका-वटका नहीं मानती थी। एक दिन उसने चिंटू के नये दिखने वाले चार जोड़ी कपड़े चुपके से सुखिया को देकर कहा,- ‘छिपा कर ले जा। मां जी देख न पायें।
            सुखिया कुल चार घरों में बर्तन मांजने और झाडू-पोंछा का काम करती थी। सब मिला कर वह ढाई हजार कमा लेती थी।
            पति सरजू ईंट भट्ठे में मजदूरी करता था, जो पाता उसे दारू में उड़ा देता था। घर में फूटी कौड़ी तक न देता। चार जनों के उस परिवार के सभी आधा पेट खा पाते। सुखिया ने कई बार पति से प्रार्थना की, ‘मेहरबानी कर के दारू छोड़ दीजिए। मेरी कमाई से किसी को भरपेट खाना नहीं मिलता।
            यह सुनते ही सरजू बिगड़ जाता-जब देखो तब तू मेरी दारू के पीछे पड़ी रहती है, जैसे वह तेरी सौतन हो। आगे कुछ बोलेगी, तो अच्छा न होगा।
            सुखिया और कुछ बोलती, तो पति की लातें खा जाती। वह जानती थी कि उसका पति सास की लापरवाही से शराबी बना है। शादी के पहले वह दारू को हाथ तक नहीं लगाता था। जब वह पहले दिन पीकर आया  तो वह चौंक उठी। उसने सास से कहा- मां जी! आपका बेटा दारू पीकर आया है। मना कीजिए। यह बरबादी के लक्षण हैं।
            तब सास ने मुस्करा कर कहा-तुम भी बहू। छोटी सी बात का बतंगड़ बना रही हो। दोस्तों की संगत में थोड़ी सी पी ली होगी। रोज-रोज थोड़े पियेगा?’
            और जब वह रोज-रोज पीकर आने लगा और घर में एक पैसा भी न देता, कुछ मांगने पर मारने को आमादा हो जाता, तब सुखिया को मजबूरन दूसरों के बर्तन मांजना पड़ा। फिर उसने पति के खिलाफ सास से कुछ नहीं कहा। उसकी सास दो चार दिन भूखी रहती तब उसे पता चलता कि बेटे को दारू पीने से न रोकने की वजह से भूखे सोना पड़ रहा है।
*
            रेखा बहुत दयालु थी। वह सुखिया को हर माह दो सौ रुपये अधिक दे देती थी। वह प्राय: कहती- सुखिया, तेरा नाम तो दुखिया होना चाहिए था। सुखिया किसने रखा।
            दीवाली के दो दिन पहले रेखा ने उसके बच्चे के लिए कुछ फुलझडि़यां, पटाखे और मिठाई दी थीं।
            तब सुखिया ने खुश होकर कहा था-भगवान आपका भला करे मालकिन। आप जैसा बड़ा दिल सबको दे। आपने चिंटू बाबा के जो कपड़े हमारे बचुवा के लिए दिये थे, वे उसके ठीक नाप के थे। उसे बहुत पसंद आये। कहता था,-मां! मेरे लिए ऐसे ही कपड़े खरीदा करो। मालकिन वह उन कपड़ों को नया समझ रहा है।
            रेखा ने मुस्करा कर कहा-चलो अच्छा है। मैं भी यही चाहती थी। दूसरे के उतारे कपड़े सुन कर वह दुखी हो जाता।
            रेखा जब अखबार पढ़ कर सुखिया को सुनाती कि कहां पर कितने लोग जहरीली शराब पीकर मर गये, तो वह कांप उठती और रोकर कहती-मालकिन हमारा खसम भी चोरी से उतारी जा रही दारू पीता है। पता नहीं, कब क्या हो जाये। सास जी से कहती हूं तो वे साफ-साफ कह देती हैं- अब वह दारू छोड़ने वाला नहीं। ज्यादा मना करेंगे तो गुस्से में हम सब को छोड़ कर कहीं चला जायेगा। कभी-कभी मन करता है मालकिन किसना को लेकर हमेशा के लिए मायके चली जाऊं। मगर वहां भी गुजारा नहीं होगा। अम्मा, बापू बूढ़े हो गये हैं। एक बड़ा भाई है। वह घरवाली के इशारे पर चलता है। पांच दिन के लिए जाती हूं तो तीसरे दिन ही भाभी कहती हैं- कब लौट रही हो ससुराल? सुन कर बापू कुछ नहीं बोलते, वे मजबूर हैं। बेटे की कमाई खा रहे हैं। बेचारी अम्मा मन मसोस कर रह जाती हैं।
            रेखा उसे सांत्वना देती-मैं तुम्हारी परेशानी समझ रही हूं सुखिया। तुम्हारे लिए जितना कर सकती थी, कर रही हूं। हम कोई लखपती नहीं हैं। वे एक दफ्तर में क्लर्क हैं। थोड़ा पैसा और मिलता, तो कहती , जिस चीज की जरूरत हो, मांग लेना।
            ‘यह आपकी मेहरबानी है मालकिन। मैं जिन पैसे वालों के यहां काम करती हूं,  मुझसे बात करना पसंद नहीं करते। पैसा बढ़ाने को कहती हूं, तो जवाब मिलता है, आजकल बर्तन साफ नहीं हो रहे। झाड़ू-पोंछा भी ठीक से नहीं लगता। ऐसा कब तक चलेगा। मालकिन वे शादी ब्याह में बची मिठाई कूडादान में फिंकवा देते हैं, लेकिन नौकरों को नहीं देते।
            रेखा ने कहा-जानती हो क्यों ? कुछ पैसे वाले अपने नौकर को यह सोच कर अच्छी चीज नहीं देते, कि अगर उसे उसका स्वाद मिल गया, तो चोरी कर के खाना शुरू कर देगा।
            सुखिया ने माथा ठोंक कर कहा, - ‘ हे भगवान! कैसे -कैसे लोग हैं इस दुनिया में।
            रेखा ने कहा-और भी सुन। एक दिन मैं एक करोड़पति परिवार में किसी पूजा में गयी थी। वहां मैंने कुछ दूर खड़े एक बारह साल के लड़के को अपने पिता से कहते सुना-डैडी ! आप रामू को कम पैसे क्यों देते हैं। उनसे ज्यादा तो मुझे पाकेट खर्च मिलता है। उसे इतना तो दीजिए, जिससे उसका परिवार भरपेट खा सके। जानती हो सुखिया, उसके डैडी ने क्या जवाब दिया?’
            ‘क्या कहा मालकिन?’
            ‘बोले, हम रामू को इतनी तनख्वाह देते हैं, जिससे वह जिंदा रहे, मरे नहीं और तुम्हारी होने वाली संतान की सेवा के लिए एक अदद गुलाम पैदा किये जाये। ज्यादा पैसे देंगे, तो वह अपने बच्चे को पढ़ायेगा, वह बड़ा होने पर किसी दफ्तर में बाबू हो जायेगा। तब तुम्हारी संतान की सेवा के लिए गुलाम कहां से आयेगा।
            सुन कर सुखिया अवाक रह गयी।
            रेखा ने फिर कहा-जानती हो सुखिया! यह उस बच्चे का डैडी नहीं पैसा बोल रहा था।
            ‘लेकिन पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं मालकिन। पैसे वालों में आप जैसे भी लोग होंगे।
            ‘ हा हैं, जो खानदानी रईस होते हैं। जो बेईमानी से नहीं बने। जो तिकड़म कर के बने उन्हीं का पैसा बोला करता है, वे नहीं। लगता है तुम खानदानी रईसों की बात कर रही हो।
            पता नहीं मालकिन। ¢


Saturday, January 28, 2017

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी भाग-28

  
पत्नी नीरू को खोने के बाद वे हमेशा उदास रहने लगे थे


भाभी के निधन के बाद से भैया पहले जैसे नहीं रहे। रोतों को हंसानेवाला आदमी हमेशा खोया-खोया और उदास लगने लगा। हमारी हमेशा कोशिश होती कि उनको ढांढस बंधायें और उन्हें गम के उस दर्द से बाहर लायें जिसमें शायद वे तिल-तिल कर खुद को खत्म करने लगे थे। हिंदू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी की संज्ञा दी गयी। उसे सहभागिनी कहा गया है। जिनमें धार्मिक आस्था और अपने पुनीत संस्कारों का भान है वे इन शब्दों को अक्षरश: मानते हैं। अगर किसी का साथी जीवन के सफर में पहले ही साथ छोड़ दे तो उसके लिए इससे बड़ा कोई दुख नहीं हो सकता। भरे-पूरे परिवार में भी वह व्यक्ति खुद को अकेला पाने लगता है। यही भैया रुक्म के साथ हो रहा था। वे लिखने-पढ़ने में खुद को व्यस्त रखने की कोशिश करते लेकिन घर में भाभी की कमी उन्हें चौबीसों घंटे सालती रहती। उनकी वह बीमारी जो पहले कुछ ठीक हो गयी थी धीरे-धीरे उदासी और भाभी के गम में बढ़ने लगी। हम लोग उन्हें किसी तरह से समझा कर रखने की कोशिश करते लेकिन यह अक्सर असफल ही रहती क्योंकि जो सच था वह तो ढांढस से झूठ हो नहीं सकता था। इस पर पुराने यार-दोस्त मिलने और भाभी के निधन पर शोक जताने आते तो जैसे उनके गम के घाव फिर हरे हो जाते। कुछ दिन बाद तो आनेवालों से हम संकेत में समझाने लगे कि वे भाभी का जिक्र ना करें।
भैया रुक्म ने पत्रकारिता में एक युग बिताया था और उनके साथ तरह-तरह के अनुभवों का खजाना था। जब खाली होते तो उनको यादों के पुराने गलियारों में जाने और वहां से कुछ बातें सुनाने की जिद करता तो फिर पत्रकारिता के कई अनजाने किस्से अनावृत्त होते चलते। वे अक्सर समझाया करते अपना काम सत्य,निष्ठा और लगन से करते जाओ, मत सोचो कौन, क्या कर या कह रहा है। अगर तुम सच्चे हो, अपने काम के पक्के हो और ईमानदार हो तो भले ही तुम्हें कोई पुरस्कार मिले न मिले यह संतोष जीवन भर के लिए रहेगा कि तुमने कोई गलत काम नहीं किया। कभी ऐसा कुछ मत करना जिससे तुम्हारी तरफ कोई उंगली उठा सके। काम वैसा ही करना जिससे संतोष हो और जिसमें कोई दोष ना हो। पैसा कमाने का शार्ट कट दुनिया में कई बार मुसीबत भी लाता है। जो कमाया जाये उसमें ईमानदारी हो तो फिर भगवान भी मदद करते हैं। वे कहते कि उन्होंने कई ऐसे लोगों को देखा है जिन्होंने गलत ढंग से पैसे कमाये और खूब ऐशो आराम किया लेकिन अंत में भिखारी की मौत मरे। बुरे ढंग से कमाया गया , अधर्म का पैसा हमेशा शांति-सुख ही दे जरूरी नहीं।
उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था। जब भी कोई नयी पत्रिका निकलती वे मुझसे उसका पहला अंक लाने के लिए जरूर कहते। वे हर ऐसी पत्रिका में रचनाएं भेजते और अधिकांश में उनकी रचनाएं छपती भी थीं। जिनमें उनकी रचनाएं छपतीं वे अंक वे अपने पास सुरक्षित रख लेते थे। लिखने वगैरह के
मामले में मैं पहले से ही जरा सुस्त ही रहा हूं। वे अक्सर मुझसे कहते-अरे यही उम्र है खूब लिखो। तुम्हारी उम्र में मेरी कहानियां, उपन्यास तक प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे थे। मैं उन्हें गौर से सुनता पर शायद क्यों जो लिखता हूं स्वांत सुखाय ही कहीं भेजने का न मन करता है और  ना ही भेजता हूं। खुद भैया भी कभी-कभार कहते थे और मैं भी मानता हूं कि सभी जगह नहीं लेकिन कहीं-कहीं बार-बार कुछ जाने-पहचाने नामों को ही छापा जाता है। ऐसे में आपकी सही और सशक्त रचना भी वापस लौट आये तो ताज्जुब नहीं। तब आप अपने आपको उन लोगों से बौना महसूस करने लगेंगे जो बराबर छप रहे हैं। कुछ संपादक अपने जान-पहचान के लेखकों को तरजीह देना ज्यादा पसंद करते हैं। रुक्म जी ऐसे नहीं थे वे नये लोगों को ही ज्यादा मौका देते थे।  खैर उपरोक्त बातों  का जिक्र मैंने किसी पर दोष मढ़ने की गर्ज से नहीं किया बल्कि उस रवायत की ओर संकेत करने के लिए किया है जो आजकल कई पत्र-पत्रिकाओं में आम हैं। कुछ ऐसे नये लेखक जिनकी सशक्त रचनाएं तक बैरंग लौट आती हैं मुझसे इत्तिफाक करेंगे।
भैया रुक्म को हमने जिंदगी में इतना उदास और टूटा हुआ कभी नहीं पाया जितना भाभी के जाने के बाद पाया। दूसरों को हौसला देने वाले भैया खुद हौसला खो बैठे थे और जैसे तिल-तिल कर घुल रहे थे।  हमारे पास उन्हें दवाइयों और दिलासों के बल पर बचाये रखने के अलावा और कोई चारा नहीं था। हम वही कर रहे थे। बीमारियां भी शायद उदास और दुखी आदमी पर जल्दी और ज्यादा असर करती हैं। आदमी सुख-चैन से हो तो बहुत-सी बीमारियों को भूल कर जी सकता है। भैया वैसा नहीं कर पा रहे थे। वे अक्सर अपनी नीरू को खोजने लग जाते। उनकी सूनी-उदास नजरें कभी दरवाजे की तरफ घूमतीं तो कभी दूसरे कमरे की ओर शायद उस उम्मीद पर कि नीरू कहीं बाहर गयी होगी अभी आ जायेगी। लेकिन उनकी नीरू तो वहां चली गयी थी जहां से कोई लौट कर कभी नहीं आता। भैया को भी इस बात का शिद्दत से एहसास हो गया था लेकिन वे इस कमी को बरदाश्त नहीं कर पा रहे थे। उनकी बीमारियां और हमारी बेचैनियां एक साथ बढ़ने लगीं। उनकी रीढ़ की पुरानी चोट का दर्द फिर उभरने लगा और दिन ब दिन बढ़ने लगा था। उसका कोई इलाज नहीं था, जो था वह बहुत ही कष्टसाध्य और खतरनाक था। डाक्टरों से सलाह लेने पर उन्होंने बताया कि इसके लिए स्पाइन की सर्जरी करनी पड़ेगी जो सफल भी हो सकती है और नहीं भी सकती। इसमें सबसे बड़ा खतरा यह है कि अगर स्पाइन की कोई महत्वपूर्ण नर्व डैमेज हो गयी तो आदमी या तो गूंगा हो सकता है या उसे पैरालाइसिस हो सकता है। इस पर हिम्मत नहीं पड़ी। नब्बे वर्ष की उम्र को छू रहे व्यक्ति को इस टार्चर को झेलने के लिए मजबूर करना हमें अच्छा नहीं लगा। उनको ब्रांकाइटिस की पुरानी शिकायत थी जो अब धीरे-धीरे प्रबल होती जा रही थी। लोग सच कहते हैं कि वृद्धावस्था अपने आपमें एक बीमारी है उस पर अगर पहले कुछ बीमारियां शरीर में घर कर चुकी हों तो समझो आफत ही है। कब कौन प्रबल रूप धारण कर ले और गंभीर स्थिति आ जाये कहा नहीं जा सकता। (अगले भाग में जारी)